أزالت شركتا غوغل وآبل الأمريكيتين تطبيق المراسلة توتوك ToTok من على متاجر التطبيقات، وسط مزاعم بأن الحكومة الإماراتية تستخدمه للتجسس.
ويسوق التطبيق الإماراتي توتوك نفسه على أنه وسيلة سهلة وآمنة للدردشة عبر الفيديو أو النصوص، ويختلف عن تطبيق تيك توك TikTok في الصين.
ونشرت صحيفة نيويورك تايمز الأمريكية تحقيقا قالت فيه إن التطبيق الذي يشبه واتس آب، هو أداة تجسس لحكومة الإمارات.
ورغم إزالة التطبيق بالفعل إلا أن الشركة المشغلة أكدت للمستخدمين أنه سيعود إلى متاجر التطبيقات قريبا.
وكتبت في مدونة، تطبيق توتوك "غير متاح مؤقتا" في متجر تطبيقات آبل ومتجر غوغل بلاي بسبب "مشكلة فنية".
ونقلت نيويورك تايمز عن مسؤولين أمريكيين وصفتهم بالمصادر المطلعة، أن تطبيق توتوك يمنح وكالات التجسس الإماراتية إمكانية الوصول إلى محادثات وتحركات المواطن ومعلومات شخصية أخرى مثل الصور.
وأزالت غوغل التطبيق يوم الخميس الماضي، كما رفعته آبل من على منصتها في اليوم التالي. ومع ذلك، يمكن للمستخدمين الذين حصلوا على التطبيق مسبقا الاستمرار في استخدامه بدون مشكلات.
وظهر التطبيق الإماراتي قبل بضعة أشهر فقط، لكنه نجح في جذب ملايين المستخدمين من الشرق الأوسط وأوروبا وآسيا وأفريقيا وأمريكا الشمالية، وفقا لصحيفة نيويورك تايمز.
وأظهرت بيانات متجر غوغل بلاي أن التطبيق سجل خمسة ملايين عملية تنزيل على نظام أندرويد فقط قبل إزالته، في حين قال موقع "آب أني" لتتبع التطبيقات إنه كان أحد أكثر التطبيقات الاجتماعية التي تم تحميلها في الولايات المتحدة الأسبوع الماضي.
وذكرت نيويورك تايمز أن ناشر التطبيق هي شركة بريج هولدنغ ليمتد Breej Holding Ltd ، وهي مرتبطة بشركة دارك ماتر DarkMatter، وهي شركة استخبارات وقرصنة مقرها أبو ظبي، وزعمت الصحيفة أنها تخضع لتحقيقات من جانب مكتب التحقيقات الفيدرالي من أجل جرائم إلكترونية محتملة.
وتوظف "دارك ماتر" مسؤولين في المخابرات الإماراتية، وموظفين سابقين من وكالة الأمن القومي الأمريكية، وعناصر بالمخابرات العسكرية الإسرائيلية السابقة، وفقا للصحيفة.
ولم ترد توتوك ودارك ماتر أو السفارة الإماراتية في لندن على الفور على طلب الحصول على تعليق على ما نشرته الصحيفة.
وقال توتوك في مدونتها "بينما يواصل المستخدمون الحاليون التمتع بخدمتنا دون انقطاع، يمكن للمستخدمين الجدد الذين لديهم هواتف سامسونغ وهاواوي وتشاومي وأوبو تنزيل التطبيق من على متاجر التطبيقات الخاصة بصانع الهاتف".
ووعدت الشركة بالعودة "في المستقبل القريب" بميزات جديدة مثل الدفع والأخبار والتجارة والترفيه.
وتحظر الإمارات خدمات المراسلة الأخرى مثل واتس آب وسكايب، التي تقدم خدمة الرسائل المشفرة من طرف إلى طرف، على الرغم من إمكانية استخدامها في المراسلة، إلا أنه لا يمكن استخدامها في المكالمات الصوتية أو الفيديو.
وتنص سياسة خصوصية توتوك على أنه يجوز له مشاركة البيانات الشخصية للمشتركين مع "سلطات تطبيق القانون والمسؤولين والهيئات التنظيمية وطلبات الوصول القانونية الأخرى".
وتنص أيضا على أنه "يجوز لنا مشاركة بياناتك الشخصية مع شركات المجموعة."
لكن لم يرد ذكر لحكومة الإمارات العربية المتحدة.
وتقول شركة أوبجتكف- سي، المتخصصة في الأمن، إنها عملت مع صحيفة نيويورك تايمز في إجراء هذا التحقيق.
وأوضحت الشركة في مدونة أنها أجرت تحليلا لـ آى أو أس الخاص بتطبيق توتوك على جالبروكن jailbroken آى فون- أي تطبيق تم تغييره لتجاوز قيود الشركة المصنعة. وقام المحللون بفك تشفير تطبيق توتوك و "حركة مرور الشبكة" الخاصة به.
وقال المحللون إن شرعية التطبيق هي "العبقرية الحقيقية لعملية المراقبة الجماعية بأكملها".
وأكدت شركة الأمن أنها لم تعثر على ثغرات أو برامج ضارة ولا توجد أي عملية استغلال من جانب الحكومة للتطبيق.
Tuesday, December 24, 2019
Friday, December 6, 2019
एनकाउंटर पर क्या कहता है भारत का क़ानून?
तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में महिला डॉक्टर के साथ हुए रेप और फिर हत्या मामले में अभियुक्त चार युवकों को पुलिस ने मार दिया.
तेलंगाना पुलिस के अनुसार वो इन चारों अभियुक्तों को अपराध वाली जगह पर लेकर गई थी, जहां उन्होंने भागने की कोशिश की और फिर पुलिस पर हमला करने की कोशिश भी की.
पुलिस का दावा है कि इस दौरान जवाबी कार्रवाई में चारों अभियुक्त पुलिस की गोली के शिकार हो गए.
पुलिस इसे एनकाउंटर बता रही है, जबकि कई संगठन इस एनकाउंटर पर सवाल उठा रहे हैं. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस संबंध में ख़ुद संज्ञान लिया है और एनएचआरसी ने तुरंत एक टीम को घटनास्थल पर जांच के लिए जाने के निर्देश दिए हैं.
इसके साथ ही ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वुमेन एसोसिएशन ने अपने बयान में कहा है कि वो इस एनकाउंटर को 'फ़र्जी' मानते हैं.
इस एनकाउंटर की सच्चाई चाहे जो भी हो लेकिन यह शब्द एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है. लोगों के बीच चर्चा होने लगी है कि क्या एनकाउंटर के लिए किसी तरह के दिशा-निर्देश बनाए गए हैं?
भारतीय संविधान के अंतर्गत 'एनकाउंटर' शब्द का कहीं ज़िक्र नहीं है. पुलिसिया भाषा में इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब सुरक्षाबल/पुलिस और चरमपंथी/अपराधियों के बीच हुई भिड़ंत में चरमपंथियों या अपराधियों की मौत हो जाती है.
भारतीय क़ानून में वैसे कहीं भी एनकाउंटर को वैध ठहराने का प्रावधान नहीं है. लेकिन कुछ ऐसे नियम-क़ानून ज़रूर हैं जो पुलिस को यह ताक़त देते हैं कि वो अपराधियों पर हमला कर सकती है और उस दौरान अपराधियों की मौत को सही ठहराया जा सकता है.
आम तौर पर लगभग सभी तरह के एनकाउंटर में पुलिस आत्मरक्षा के दौरान हुई कार्रवाई का ज़िक्र ही करती है. आपराधिक संहिता यानी सीआरपीसी की धारा 46 कहती है कि अगर कोई अपराधी ख़ुद को गिरफ़्तार होने से बचाने की कोशिश करता है या पुलिस की गिरफ़्त से भागने की कोशिश करता है या पुलिस पर हमला करता है तो इन हालात में पुलिस उस अपराधी पर जवाबी हमला कर सकती है.
सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले पर अपने नियम-क़ानून बनाए हुए हैं.
एनकाउंटर के दौरान हुई हत्याओं को एकस्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग भी कहा जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में कहा है कि इसके लिए पुलिस तय किए गए नियमों का ही पालन करे.
इस बेंच ने अपने फ़ैसले में लिखा था कि पुलिस एनकाउंटर के दौरान हुई मौत की निष्पक्ष, प्रभावी और स्वतंत्र जांच के लिए इन नियमों का पालन किया जाना चाहिए. उस फ़ैसले की प्रमुख बातें इस प्रकार हैं:
कोर्ट का निर्देश है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत किसी भी तरह के एनकाउंटर में इन तमाम नियमों का पालन होना ज़रूरी है. अनुच्छेद 141 भारत के सुप्रीम कोर्ट को कोई नियम या क़ानून बनाने की ताकत देता है.
मार्च 1997 में तत्कालीन एनएचआरसी के अध्यक्ष जस्टिस एमएन वेंकटचलैया ने सभी मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखा था. उसमें उन्होंने लिखा था, ''आयोग को कई जगहों से और गैर सरकारी संगठनों से लगातार यह शिकायतें मिल रहे हैं कि पुलिस के ज़रिए फ़र्जी एनकाउंटर लगातार बढ़ रहे हैं. साथ ही पुलिस अभियुक्तों को तय नियमों के आधार पर दोषी साबित करने की जगह उन्हें मारने को तरजीह दे रही है.''
जस्टिस वेंकटचलैया साल 1993-94 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे. उन्होंने लिखा था, ''हमारे क़ानून में पुलिस को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी व्यक्ति को मार दे, और जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि उन्होंने क़ानून के अंतर्गत किसी को मारा है तब तक वह हत्या मानी जाएगी.''
सिर्फ दो ही हालात में इस तरह की मौतों को अपराध नहीं माना जा सकता. पहला, अगर आत्मरक्षा की कोशिश में दूसरे व्यक्ति की मौत हो जाए.
दूसरा, सीआरपीसी की धारा 46 पुलिस को बल प्रयोग करने का अधिकार देती है. इस दौरान किसी ऐसे अपराधी को गिरफ़्तार करने की कोशिश, जिसने वो अपराध किया हो जिसके लिए उसे मौत की सज़ा या आजीवन कारावास की सज़ा मिल सकती है, इस कोशिश में अपराधी की मौत हो जाए.
तेलंगाना पुलिस के अनुसार वो इन चारों अभियुक्तों को अपराध वाली जगह पर लेकर गई थी, जहां उन्होंने भागने की कोशिश की और फिर पुलिस पर हमला करने की कोशिश भी की.
पुलिस का दावा है कि इस दौरान जवाबी कार्रवाई में चारों अभियुक्त पुलिस की गोली के शिकार हो गए.
पुलिस इसे एनकाउंटर बता रही है, जबकि कई संगठन इस एनकाउंटर पर सवाल उठा रहे हैं. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस संबंध में ख़ुद संज्ञान लिया है और एनएचआरसी ने तुरंत एक टीम को घटनास्थल पर जांच के लिए जाने के निर्देश दिए हैं.
इसके साथ ही ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वुमेन एसोसिएशन ने अपने बयान में कहा है कि वो इस एनकाउंटर को 'फ़र्जी' मानते हैं.
इस एनकाउंटर की सच्चाई चाहे जो भी हो लेकिन यह शब्द एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है. लोगों के बीच चर्चा होने लगी है कि क्या एनकाउंटर के लिए किसी तरह के दिशा-निर्देश बनाए गए हैं?
भारतीय संविधान के अंतर्गत 'एनकाउंटर' शब्द का कहीं ज़िक्र नहीं है. पुलिसिया भाषा में इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब सुरक्षाबल/पुलिस और चरमपंथी/अपराधियों के बीच हुई भिड़ंत में चरमपंथियों या अपराधियों की मौत हो जाती है.
भारतीय क़ानून में वैसे कहीं भी एनकाउंटर को वैध ठहराने का प्रावधान नहीं है. लेकिन कुछ ऐसे नियम-क़ानून ज़रूर हैं जो पुलिस को यह ताक़त देते हैं कि वो अपराधियों पर हमला कर सकती है और उस दौरान अपराधियों की मौत को सही ठहराया जा सकता है.
आम तौर पर लगभग सभी तरह के एनकाउंटर में पुलिस आत्मरक्षा के दौरान हुई कार्रवाई का ज़िक्र ही करती है. आपराधिक संहिता यानी सीआरपीसी की धारा 46 कहती है कि अगर कोई अपराधी ख़ुद को गिरफ़्तार होने से बचाने की कोशिश करता है या पुलिस की गिरफ़्त से भागने की कोशिश करता है या पुलिस पर हमला करता है तो इन हालात में पुलिस उस अपराधी पर जवाबी हमला कर सकती है.
सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले पर अपने नियम-क़ानून बनाए हुए हैं.
एनकाउंटर के दौरान हुई हत्याओं को एकस्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग भी कहा जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में कहा है कि इसके लिए पुलिस तय किए गए नियमों का ही पालन करे.
इस बेंच ने अपने फ़ैसले में लिखा था कि पुलिस एनकाउंटर के दौरान हुई मौत की निष्पक्ष, प्रभावी और स्वतंत्र जांच के लिए इन नियमों का पालन किया जाना चाहिए. उस फ़ैसले की प्रमुख बातें इस प्रकार हैं:
कोर्ट का निर्देश है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत किसी भी तरह के एनकाउंटर में इन तमाम नियमों का पालन होना ज़रूरी है. अनुच्छेद 141 भारत के सुप्रीम कोर्ट को कोई नियम या क़ानून बनाने की ताकत देता है.
मार्च 1997 में तत्कालीन एनएचआरसी के अध्यक्ष जस्टिस एमएन वेंकटचलैया ने सभी मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखा था. उसमें उन्होंने लिखा था, ''आयोग को कई जगहों से और गैर सरकारी संगठनों से लगातार यह शिकायतें मिल रहे हैं कि पुलिस के ज़रिए फ़र्जी एनकाउंटर लगातार बढ़ रहे हैं. साथ ही पुलिस अभियुक्तों को तय नियमों के आधार पर दोषी साबित करने की जगह उन्हें मारने को तरजीह दे रही है.''
जस्टिस वेंकटचलैया साल 1993-94 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे. उन्होंने लिखा था, ''हमारे क़ानून में पुलिस को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी व्यक्ति को मार दे, और जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि उन्होंने क़ानून के अंतर्गत किसी को मारा है तब तक वह हत्या मानी जाएगी.''
सिर्फ दो ही हालात में इस तरह की मौतों को अपराध नहीं माना जा सकता. पहला, अगर आत्मरक्षा की कोशिश में दूसरे व्यक्ति की मौत हो जाए.
दूसरा, सीआरपीसी की धारा 46 पुलिस को बल प्रयोग करने का अधिकार देती है. इस दौरान किसी ऐसे अपराधी को गिरफ़्तार करने की कोशिश, जिसने वो अपराध किया हो जिसके लिए उसे मौत की सज़ा या आजीवन कारावास की सज़ा मिल सकती है, इस कोशिश में अपराधी की मौत हो जाए.
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